2016

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renewing life

It’s high time to break tough rules, Allow the breeze to enter my room, New year is waiting on my doorsteps, Welcoming me to accept new dares, Challenging the world and scream loud, Keeping the spirits flow in clouds, Finding ways to release some pain, Living the life without depressed stains, Loving my soul, thoughts,…

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शिकायत नहीं आत्मसम्मान पर वार करने वालो से,
कमबख्त तकलीफ तो रूह कि कैफियत से होती है|

school memories
Decoration outside principal’s home.
school church
A glimpse of school church.
school church
School Church
school church
I learnt chanting carols here. 🙂
school church
School church! 🙂
christmas tree
Christmas tree at school church.
school church
Another amazing corner of school church.
Library
Shhhh… 😀
junior-section
Junior section. Miss those color games… ‘What color you want?’ 😀
notice-board
Our creative instincts was always hungry for this corner. 😀
notice-board
Some intellects. 🙂
roll-of-honour
Roll of Honour. 🙂
principal-residence
Outside Principal’s residence
school memories
Ufff… these school memories. 🙂
alma-mater
Alma Mater! 🙂
creative corner
Another creative corner
🙂
school memories
This was suppose to be my 12th class. 🙂
A creative board in senior section.
school memories
We never shouted outside this room. We preferred to keep it within the class. 😛
school-church
We all wrote our wishes here with candles. 🙂
school memories
Dear school, I miss every bit you. 🙂

*P.S. In response to the daily prompt word, festive

जब कला, योग्यता व् गुणों का मोल-भाव किया जाता है तब दहेज़ जन्म लेता है| इसके खिलाफ आवाज़ उठाना हम सबका फ़र्ज़ है| पर क्या हम भेंट कि आड़ में इसे अपने घरों में पनपने तो नहीं दे रहे?

यह कविता ससुराल या लड़कों पर प्र्श्न नहीं उठाएगी| ये प्र्श्न उठा रही है आप और मुझ पर| ये एक दबी हुयी आवाज़ है जो कभी-कभी इस देश के कुछ हिस्सों में सुनाई देती है|


वो फर्क करते हैं हमारी तरक्की पर,
नाज़ करते हैं बुद्धिमत्ता पर,
हमारी कला उन्हें रचनात्मक लगती है,
कल्पनाओं का समुन्दर प्रतीत होती है|

हम उन्हें गुणों का भण्डार लगते हैं,
शायद गर्व करने का तुछ सामान लगते हैं,
कड़ी तपस्या कि अपेक्षा वो हमसे कहाँ करते हैं,
किस्मत को उगते सूरज कि सीढ़ी समझते हैं|

सम्पति से वो हमारा मान करते हैं,
झुमकी कँगनो से अपनापन नापते हैं,
हमारी नज़्मों में सरस्वती ढूंढते हैं,
फिर लक्ष्मी से तुलना कर,
उसे अपमानित कर देते हैं|

ज्ञान से भरपूर साथी कि कामना करते हैं,
पर शिक्षित बहुओं का कहाँ सम्मान करते हैं,
सपनों को कुचलना तो फ़र्ज़ है महिलाओं का,
आखिर कला को छुड़वाना तो हक़ है ससुराल का|

आप कहते हैं मैं लिखा करूँ,
विचारों को चंद पन्नो पर बिखेरा करूँ,
पर ये जो चीख मुझे रोज़ सुनाई देती है,
भावनाओं को नम सा कर देती है,
दिल को एड़ी से कुचला करती है,
फिर व्यंग का रस घोलकर,
स्याही का दर्द सन्नाटों में बयाँ करती है|