दादी, हमारी सुपरवुमन (Short Story)

कहते हैं हर रात के बाद उजाला होता है, हर अँधेरे रास्ते में छुपी हुयी रौशनी की किरण होती है और हर बुरे वक़्त का एक अंत होता है| ज़िन्दगी के ये मोड़, ऊंच-नींच, और उलटे-सीधे से रास्ते, कई बार हम बहुत कम वक़्त में तय कर लेते हैं| एक के बाद एक मुश्किल का सामना करना, हर मुश्किल की घडी में खुदको कहना की ‘बस, इससे बुरा और कुछ नहीं हो सकता’ और फिर वापस एक और मुश्किल का सामना करने के लिए खड़े हो जाना| शायद, ये ही ज़िन्दगी है|

दोपहर के कुछ एक या डेढ़ बज रहे थे| माँ को आज पापा के साथ अस्पताल जाना था| हर महीने जब भी माँ डॉक्टर आंटी से मिलने जाती हैं, तो दादी एक लम्बी सवालों की सूची उन्हें थमा देती हैं|

‘डॉक्टर से तुम्हारे पैरों की सूजन की वजह पूछना मत भूलना| कल तुम्हे उल्टी हुयी थी याद से बता देना| और हाँ, ज्यादा अल्ट्रासाउंड मत कराना| बड़े बुजुर्ग बोलते थे कि अच्छा नहीं होता बच्चे की सेहत के लिए|’

दादी हमारी सुपरवुमन हैं| पता नहीं कैसे रसोई का सारा काम समेटते हुए भी इतनी सारी बातें एक साथ बोल जाती हैं| भगवान् जाने याद कैसे रहता हैं उन्हें|


‘अरे ऐसे नहीं होता माँ| मैंने पड़ा है इंटरनेट पर| ये सब साधारण बातें हैं|’ दादी की बातें नज़रअंदाज़ करते हुए माँ ने जवाब दिया|

लेकिन मेरी दादी भी कहा कम हैं| सफाई का कपडा रसोई के पत्थर पर पटकते हुए झुंझलाकर बोली, ‘हाँ हाँ| इंटरनेट ने ही तो पैदा किया है तुम्हे और पियूष को| मैंने और तुम्हारी मम्मी ने बस गूगल पर लिख दिया था की बच्चे चाहिए और तुम हमारे गोद में थे|’

माँ और दादी की बातें मैं समझ ही नहीं सकता| कोई बहस के बाद ठट्टे मारकर कैसे हंस सकता है?


कुछ 15 मिनट के इंतज़ार के बाद डॉक्टर आंटी ने माँ को बुलाया| कमरे में दाखिल होते ही, डॉक्टर आंटी माँ को बिस्तर के तरफ इशारा करते हुए बोली, ‘क्या बात है निकिता, आज बड़ी सुंदर लग रही हो| अच्छे से ध्यान रख रहे हैं पियूष जी तुम्हारा|’

‘चलो, किसी ने तो माना की मैं इसका ध्यान रखता हूँ| वरना आजकल तो कोई मुझे पूछता ही नहीं| बस डांट ही खाता रहता हूँ… कभी मम्मी से तो कभी इससे|’ पापा ने हँसते हुए जवाब दिया|

माँ ने एक अच्छी बहु के तरह दादी की याद दिलाई हुयी सारी बातें एक-एक करके डॉक्टर आंटी को बतानी शुरू करदी|

‘एक बार अल्ट्रासाउंड कर लेते हैं|’

‘कुछ दिक्कत है क्या डॉक्टर?’ माँ ने हिचकते हुए पूछा|

‘नहीं, कुछ खास नहीं| बस हर बार की तरह तसल्ली करने का मेरा एक छोटा सा उपाय|’

माँ और पापा ने आँखों ही आँखों में कुछ बातें की| शायद, पापा माँ से अपना डर छुपा रहे थे| कुछ पकडे जाने का डर| जैसे उन्हें तसल्ली दे रहे हों, ‘यकीन रखो| सब ठीक है… मैं हूँ तुम्हारे साथ’|

अल्ट्रासाउंड करते वक़्त डॉक्टर आंटी के चेहरे पर हमेशा वाली मुस्कुराहट नहीं थी| एक चिंता सी झलक रही थी उनके चेहरे पर|

‘निकिता, मुझे लगता है कि तुम्हारे आँगन में किलकारियां उम्मीद से थोड़ा पहले गूंजेंगी|’

‘मतलब?’ माँ डॉक्टर आंटी का इशारा समझ तो चुकी थीं पर फिर भी उनका डर आश्वासन चाहता था… डॉक्टर आंटी की जुबां से|

‘हमें ऑपरेशन करना पड़ेगा| बच्चे की पोजीशन गलत है| डिलीवरी आज ही करनी पड़ेगी|’

‘आज ही? मेरा बच्चा तो ठीक है न डॉक्टर|’ माँ ने भारी आवाज़ में डॉक्टर आंटी से पूछा|

‘घबराओ मत| ऐसा हो जाता है| ऑपरेशन आजकल बहुत मामूली बात है| हम ऑपरेशन एहतियात के तौर पर कर रहे हैं|’

डॉक्टर आंटी की बातें सुनकर माँ ही नहीं पापा के चेहरे पर भी डर, चिंता, बेचैनी, और घबराहट जैसे सारे भाव एक साथ झलक पड़े| पर ऑपरेशन के लिए उन्होंने शायद फ़ौरन हामी सिर्फ इसलिए भर दी क्यूंकि हमारे यहाँ भगवान् के बाद अगर इंसान किसी पर भरोसा करता है तो वो है डॉक्टर| और गलत भी क्या है? अपनों की जान किसे प्यारी नहीं होती| और मैं तो अभी भी माँ के शरीर का सबसे एहम हिस्सा हूँ|


पापा ने दादी को फोन कर अस्पताल बुला लिया| मेरे आने का इंतज़ार दादी को सबसे ज्यादा है| पर मेरा स्वागत उन्हें सातवें महीने में ही करना पड़ेगा, ये उम्मीद बिल्कुल नहीं थी उन्हें| जब तक दादी आई तब तक माँ को कमरे में ऑपरेशन के लिए ले जा चुके थे|

दादी को अभी अस्पताल पहुंचे बस 10 मिनट ही हुए थे कि नर्स ने आकर बताया की लड़का हुआ है| पापा वहीँ बैठ गए| हंसी और आंसूं एक साथ कुछ अजीब से लगते है ना? बस, कुछ ऐसा ही हाल था मेरे पापा का| पर दादी, उन्हें बिना सवाल पूछे ख़ुशी कहाँ होती है|

‘बच्चे के रोने की आवाज़ इतने देरी से क्यों आई? सांस तो नहीं अटकी उसकी?, निकिता ठीक तो है ना?, कोई खतरा तो नहीं?, बच्चा सातवें महीने में ही हो गया, कमज़ोर होगा न सिस्टर?’

‘Mam! बच्चा और माँ दोनों ही खतरे से बाहर हैं| आप चिंता न करें|’ इतना कहकर नर्स अंदर चली गयी|

‘बड़ी बत्तमीज़ नर्स है| कैसे मुहं चढ़ाके जवाब दे रही थी| अरे भाई सात मासि बच्चा हुआ है चिंता भी न करें| पता नहीं निकिता कैसी होगी| अंदर भी नहीं जाने दे रहे| पियूष, ध्यान रखना बच्चा आँखों से ओझल न हो पाए| अक्सर ऐसे बड़े-बड़े अस्पतालों में बच्चे बदल जाते हैं| इनका क्या भरोसा…’

दादी की बात पूरी भी नहीं हुई थी की पापा ने उन्हें बाहों में भर लिया और बोले, ‘माँ, तुम दादी बन गयी’| दादी को शांत करने का ये आखिरी उपाय आता है पापा को|

आंसूं की एक बूँद दादी के गाल पर गिरी ही थी की झट से उसे पोंछते हुए बोली, ‘हाँ हाँ, पता है| पर मैं तो दादी बन गयी लेकिन तू कब बड़ा होगा| बाप बन गया है| ज़िम्मेदारी बढ़ गयी है तेरी| निकिता की तरफ भी और हमारे नए मेहमान की तरफ भी|’

‘और आपकी तरफ?’ पापा ने हँसते हुए पूछा|

‘तू मेरी चिंता मत कर| मेरी चिंता करने वाला आ गया|’ उस दिन दादी के चेहरे पर एक तसल्ली सी थी|


मैं अभी पापा और दादी से नहीं मिला था| बस माँ का हाथ अपने सर पर महसूस किया था| एक सुकून सा महसूस हुआ माँ के स्पर्श से| उनके छूते ही नींद आ गयी|

अचानक एक शोर सा सुनाई दिया| शायद माँ रो रही थी| लेकिन क्यों? ऐसे में तो माँ अक्सर खुश होती हैं| फिर ऐसा क्या हो गया था की मेरी नींद माँ की सिसकियों से खुली?

‘ऐसे कैसे हो सकता है डॉक्टर? सब कुछ ठीक था… आप ही ने तो कहा था|’ माँ ने तिलमिलाते हुए डॉक्टर से पूछा|

‘मुझे पता है की मैंने ही कहा था की सब ठीक है| तुम्हारे अल्ट्रासाउंड में बच्चे की पोजीशन ठीक नहीं थी और तुम्हारा BP भी बढ़ा हुआ था| ऐसे में अगर मैं तुम्हे ये बात भी बता देती तो शायद तुम इसे सहन नहीं कर पाती और BP और बढ़ जाता| तुम्हारी जान को भी खतरा हो सकता था|’

‘लेकिन ऐसा तो नहीं की आपको अभी पता चला हो| अल्ट्रासाउंड तो पहले भी हुआ था मेरा| तब क्यों नहीं बताया आपने मुझे|’ माँ ने चिलाते हुए डॉक्टर से पूछा|

‘अगर तब मैं बता देती तो क्या करती तुम?’ डॉक्टर ने कड़े स्वर में माँ से पूछा|

‘शायद इसे जन्म ही ना देती| एक ख़राब ज़िन्दगी देने से तो अच्छा है की ज़िन्दगी नसीब ही न हो|’

‘तो फिर इसका जवाब तुम अपने पति और सास से लो| उन्हें सब पता था|’

ये क्या बातें हो रही थी| मुझे तो अपने भाव प्रकट करना भी नहीं आते अभी ठीक से| क्यों मेरी माँ मुझे मारने की बातें कर रही है? क्यों अभी वो मुझे गोद में उठाकर चुप नहीं करा रही? क्या मेरे से कोई भूल हो गयी है?

‘मेरे पति और सास कहाँ हैं डॉक्टर?’

‘मैं भेजती हूँ उन्हें|’ इतना कहकर डॉक्टर आंटी कमरे से बाहर चली गयी|



पापा और दादी मुस्कुराते हुए कमरे में घुसे तो ज़रूर लेकिन माँ का चेहरा देखकर समझ चुके थे कि उन्हें कुछ ऐसा पता चल गया है जो वो दोनों ही उनसे छुपा रहे थे|

‘आप लोगो ने मुझे बताया क्यों नहीं?’

‘क्या नहीं बताया, निकिता?’ पापा ने कड़े स्वर में पूछा|

‘बनो मत पियूष| इतनी बड़ी बात आपने मुझसे छुपाई|’

‘बेटा…’ दादी कि बात काटते हुए माँ बोली, ‘आप तो बोलिए ही मत मुझसे| आपको चाहिए था न ये बच्चा| इसीलिए अपने पियूष को भी चुप रहने को कहा|’

‘माँ से ऊँची आवाज़ में बात मत करो, निकिता| वो सिर्फ हमारा भला चाहती थी|’ इस बार पापा की ऊँची आवाज़ में गुस्सा साफ़ झलक रहा था|

‘भला? कैसा भला? एक विकलांग बच्चे को जन्म दिया है मैंने| दो के बजाये तीन पैर हैं इसके| क्या करेगा ये अपनी ज़िन्दगी में?’

‘तुम्हारी तरह इंजीनियर बनेगा| किसी बड़ी कंपनी में बैठकर लाखो कमाएगा| और IT उद्योग में इंजीनियर्स को घूमना थोड़ी होता है| यही बोलती थी न तुम, निकिता?’ इस बार, दादी की नाराज़गी और गुस्सा उनके जवाब में साफ़ बयान हो रहा था|

माँ चुप हो गयी और फ़ूट-फ़ूटकर रोने लगी| माँ को भी तो माँ की ज़रूरत होती है| वो माँ जो कभी डांटे तो कभी प्यार से सहला दे| डांट तो वो खा चुकी थी तो अब प्यार की बारी थी|

दादी, माँ के करीब बैठ गयी| उनका हाथ थामा और बोली, ‘मैंने अपनी ज़िन्दगी में कुछ खास नहीं किया| 20 साल की थी जब माँ पिताजी ने शादी करादी थी| तुम्हारी तरह डिगरियां भी नहीं हैं मेरे पास| स्कूल के बाद किताबें देखीं तो पर सिर्फ पियूष की|’

‘पर अपने अनुभव से मैंने बस एक चीज़ जानी है| और वो ये कि ज़िन्दगी सिर्फ तुम्हे तब हरा सकती है जब तुम हारना चाहो| और जब वो नहीं हरा पाती तो तुम्हारे बच्चों के ज़रिये तुम्हे हराने की कोशिश करती है|

जब भी पियूष बचपन में मुझे हँसके माँ बुलाता था, मेरी पूरी ज़िन्दगी सफल हो जाती थी| तब मुझे ये चिंता नहीं होती थी कि पियूष अपनी बाक़ी ज़िन्दगी पोलियो के साथ कैसे काटेगा|

‘मैं और तुम्हारे पापा चाहते तो एक और बच्चा कर सकते थे| पर हमने पियूष में अपनी ज़िन्दगी देखी|’

‘तुम्हारा बच्चा अनोखा नहीं है| हम सब में से एक है| उसे उसकी पहचान खुद बनाने दो| तुम तो पढ़ी लिखी हो, आज के ज़माने की मॉडर्न लड़की हो| सबके खिलाफ जाकर तुमने पियूष से शादी की| जैसा वो है वैसा उसे अपनाया| अब अपने ही हिस्से को अपनाने में क्या शर्म?’

माँ ने अपने आंसू पोछे और बचकानी आवाज़ में बोली, ‘आप कितना बोलते हो|’

और फिर इतने लम्बे ड्रामे के बाद मेरे घरवालों ने आखिरकार मेरे रोने पर ध्यान दिया| पापा सही कहते हैं| औरतों को कोई नहीं समझ सकता|

Note: English translation of this short story will be added soon. For more short stories click here.

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