Shayari

हँसी-ठिठोली कि लड़ियाँ जब शोर का रूप लेती हैं,
बंद द्वार के पीछे सुख बिखेर देती हैं,
कक्ष के एक कोने में तब हँसी साँस लेती है,
गम के दरवाज़ों को मुस्कान से वो ढक देती है|

पहली साँस तो बेपरवाह पँछी सी होती है,
हलक-ए-पर तो बस मोहब्बत की बलि चढ़ते हैं|

शिकायत नहीं आत्मसम्मान पर वार करने वालो से,
कमबख्त तकलीफ तो रूह कि कैफियत से होती है|

आप कहते हैं मैं लिखा करूँ,
विचारों को चंद पन्नो पर बिखेरा करूँ,
पर ये जो चीख मुझे रोज़ सुनाई देती है,
भावनाओं को नम सा कर देती है,
दिल को एड़ी से कुचला करती है,
फिर व्यंग का रस घोलकर,
स्याही का दर्द सन्नाटों में बयाँ करती है|

लव्ज़ों में बयाँ हो जाता तो क्या बात थी,
दर्द सीने में उतर गया था, वो भी एक रात थी|
बिस्तर का एक कोना तब भी भीगा था,
आँचल ने गम अपने बाहों में भरा था,
ओझल तेरा चेहरा दुनिया से हुआ था,
मेरी यादों में घर तेरा फिर से बना था|


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