Audio

*Please use earplugs in case you find problem while hearing this video on your mobile phone.

Hindi Transcription:

वो मुझे तोड़ता मरोड़ता है,
और मेरे दम पर चीख-चिल्लाता है,
अब लोकतंत्र की गुहार लगाता है,
पर मुझी को भूल जाता है…

आज़ादी का पाठ पढ़ाता है,
हक़ की दुहाई देता है,
घरों को वो जलाता है,
फिर भी देशभक्त कहलाता है,
अब लोकतंत्र की गुहार लगाता है,
पर मुझी को भूल जाता है…

जाती पर गर्व वो करता है,
पर कुदरत को दूषित करता है,
स्वच्छता का पाठ पढ़ाता है,
सड़को पर थूक कर जाता है,
अब लोकतंत्र की गुहार लगाता है,
पर मुझी को भूल जाता है…

बटवारे की निन्दा करता है,
पर बिछड़ो को दुश्मन कहता है,
एकता का नारा विदेश में लगाता है,
पर देश को राज्य गिनाता है,
अब लोकतंत्र की गुहार लगाता है,
पर मुझी को भूल जाता है…

अन्देखी शक्ति मानता है,
विधि-विधान को जानता है,
धर्म पर मर-मिटने का इछुक है,
इंसानियत को ठुकराता है,
अब लोकतंत्र की गुहार लगाता है,
पर मुझी को भूल जाता है…

अधीनता को ठुकराता है,
खुद की सरकार चुनकर लाता है,
ए मुर्ख,ज़रा नज़रें घुमा,
तेरी सरकार मेरी अधीन है,
मेरी मर्ज़ी की पराधीन है,
मैं लोकतंत्र बनता हूँ,
तभी संविधान कहलाता हूँ|


NOTE:  You can now hear all our audio blogs on our Soundcloud and YouTube channel.

Background Music Credit

Heavy Heart Kevin MacLeod (incompetech.com)
Licensed under Creative Commons: By Attribution 3.0 License
http://creativecommons.org/licenses/by/3.0/

Transcription of डोर (Valentine’s Day Special)

वो सर्द हवाओं का मौसम आया है,
घटाओं ने भी गीत गुनगुनाया है,
चांदनी रातों में तेरी छुअन की तपिश ने,
आज फिर एक तूफ़ान सा लाया है|

तूफ़ान की लड़ी के साथ दिन निकले हैं,
पर तेरी मुस्कुराहट गुलाब की महक में बिखरी है,
आज मेरे पँखों ने फिर उड़ान भरी है,
तेरी हँसी के साथ मेरी पायल भी झूमी है|

दीवानो की भरी इस महफ़िल में दिल तुझको याद करता है,
मोहब्बत का पैगाम तुझको देने की फ़रियाद करता है,
पर दुनिया की ज़ंजीरों ने हमको बांध लिया है,
तुझसे दूर न रहने के मेरे फैसले पर फतवाःजारी किया है|

धर्म के रखवालों को कोई ये समझाए,
कि मोहब्बत की ये डोर उन्ही के रब ने बनायी होगी,
उन्ही की इबादत के फूलों से ये डोर सजाई होगी,
उनकी हिस्से की दुआएं हमें लगायी होगी,
तभी तो ये फूलों की डोर इतनी मज़बूत बनायी होगी|


NOTE: This podcast (poem) is created for the audience of Vaidus World on the occasion of Valentine’s day. You can now hear all my podcasts (audio blogs) on my Soundcloud channel.

Audio Credit: “Gymnopedie No. 1” Kevin MacLeod (incompetech.com);  Licensed under Creative Commons: By Attribution 3.0; http://creativecommons.org/licenses/by/3.0/

Image Credit: Pixabay

‘नादान दिल’: Story Of Heart (Transcription in Hindi)

किसी ने दस्तक दी दिल को,

नादान आहट से ही डर गया,

खुला जो दरवाज़ा दिल का,

तो अपने आपको सौंप गया|

बंद दीवारों में ख़ुशी की लहर उठी,

आज़ादी की साँस आज फिर उसने ली,

बोला, आज फिर मोहब्बत करने का मन करता है,

झूम कर फिर इश्क़ बयां करने का मन करता है|

बाहों में झूलते हुए खुद को भुला बैठा,

किसी की आशिकी में अपना वजूद मिटा बैठा,

अपनेआप को सौंप कर उसे अपना मान बैठा,

कल्पना में उसके साथ अपना घर बना बैठा|

पर मेहमान तो आखिर मेहमान होता है,

दो दिन की ख़ुशी बांटकर अपने घर चल देता है,

नादान दिल आज फिर अकेला बैठा है,

दस्तक के इंतज़ार में,

आज फिर किसी मेहमान की राह देख रहा है|


NOTE: You can now hear all my podcasts (audio blogs) on my Soundcloud channel.

Background Music Credit: “Gymnopedie No. 1” Kevin MacLeod (incompetech.com) Licensed under Creative Commons: By Attribution 3.0 http://creativecommons.org/licenses/by/3.0/

Image credit: Pixabay

बेटी: Story of A Woman

मैं बेटी बनके आती हूँ बहु बनके जाती हूँ,

मेरी किलकारी बनती है चीख फिर भी चुप रह जाती हूँ,

बेटी से माँ का सफर एक पल में तय कर जाती हूँ,

तुम्हारे नाम को भी मैं अपना बना जाती हूँ|

अपने माँ-बाप को छोड़ तुम्हारे माँ-बाप को अपनाती हूँ,

उनकी सेवा कर अपना फ़र्ज़ निभाती हूँ,

उनके चरणो में अपना स्वर्ग ढूंढने जाती हूँ,

पर फिर भी अंत में, मैं ही बहु कहलाती हूँ|

झूले को छोड़, तेरा चूल्हा मैं जलती हूँ,

ज़मीन पर बिखरी ओढ़नी, अब सर पर लिए जाती हूँ,

सरक जाता है जो मेरा आँचल सर से, तो कुलटा मैं कहलाती हूँ,

अपने अंश को भी तेरा ही नाम दे जाती हूँ|

चूल्हे की जली रोटी पे माँ की सीख का ताना मैं सुनती हूँ,

हर पल अपनी जन्म-जननी को कलंकित भी मैं ही करती हूँ,

सुबकती बिलखती चुप भी खुद हो जाती हूँ,

पलकों में छुपी नींद में अपनी माँ का आँचल ढूंढा करती हूँ|

वो बचपन की हंसी को मैं हर पल खोजा करती हूँ,

अपनी बेटी को हँसते देख मैं अक्सर ये सोचा करती हूँ,

क्या इसकी हंसी भी, हंसी को ढूँढा करेगी?

क्या ये भी मेरी तरह अपनी माँ को ढूढ़ा करेगी?

तेरे बचपन को मैं ना खोने दूंगी,

तेरे साथ मैं ये अन्याय ना होने दूंगी,

तेरी पहचान तू खुद बनाएगी,

इस दुनिया को अपने परिवार के साथ तू ही तो चलाएगी|

तेरा जीवन दुनिया का मार्ग दर्शन होगा,

तेरा आँचल सबकी छाव बना करेगा,

तेरी रोटी सबको भाइयेगी,

तो तेरी हंसी सबको हंसाएगी|

अपने बच्चों को तू खुद ही पढ़ाएगी,

अपनी माँ पर ताने तू अब ना खायेगी,

अब तू आंसू ना बहाएगी,

तू ही बस, अब इस देश के हर एक घर को चलाएगी|


NOTE: You can now hear all my podcasts on my Soundcloud channel.

Background Music Credit: “Crossing the Divide” Kevin MacLeod (incompetech.com), Licensed under Creative Commons: By Attribution 3.0

मेरी बदसूरती का कारण तू है,
चाँद पे दाग जैसे दिखने वाले कलंक का कारण तू है,
अपनो से रुस्वा होने का कारण भी तो तू है,
अब मेरे हर आँसूं का कारण बस तू है.

लोगो के सवाल का कारण तू है,
मेरे हर जवाब का कारण तू है,
लोगो की हंसी का कारण तू है,
तो मेरी बेबसी का कारण भी तू है.

सबके तानो का कारण तू है,
बन्ने के ना का कारण तू है,
अपनेआप से घरिंडा का कारण तू है,
अकेले सुबकने का कारण तू है.

इस अकेलेपन का कारण तू है,
इस गुस्से का कारण तू है,
सीने में पनपते ज्वालामुखी का कारण तू है,
तो मेरी हर बेचैनी का कारण भी तू  है.

मैं पूछती हूँ तू है कौन?
मेरी परछाई बनी घूमती क्यों है?
दिल के हर दरवाजे को बंद करे बैठी हूँ,
फिर तू मेरे पास क्यों है?

दिल कहता है तुझे अपने से दूर करदु,
इस जहां में ख़ुशी चाहती हूँ, तो तुझे फन्ना करदु,
ये सच है, तो क्यों जगदोजहद होती है मेरे मन में,
दिल और दिमाग की इस लड़ाई में,
मैं क्यों पिसती हूँ हर दफा…

NOTE: You can now hear all my podcasts (audio blog) on my Soundcloud channel.

चल घर की सैर कराऊँ: Journey Of A Home (Transcription)

मैं अक्सर घर को याद करता हूँ,
वहाँ पहुँचने की खुद ही से फरियाद करता हूँ,
अब तो आँगन भी बुलाया करता है मुझे,
वो बेल का बूढ़ा पेड़, ख़्वाबों में रुलाया करता है मुझे,
अपनी साइकिल की घंटी सुनाई देती है मुझे,
माँ की डाँट आज भी डराती है मुझे|

आज भी अचार की बरनी से चोरी करने का मन करता है,
माँ के हाथों से कान खीचने में, आज भी तो दर्द होता है,
माँ रहती है मेरे साथ इस परायी नगरी में,
पर उसका दिल भी यहाँ कहाँ लगता है|

मुस्कुराती नज़रों से मेरे सपने आज भी देखती है वो,
हर सुबह बचपन की तरह मुझे खाना देती है वो,
कहती है तू जहाँ, वहाँ मेरा घर है बसा,
पर अपना होने का एहसास, उसे ये मकान कहाँ देता है|

वक़्त की इस दौड़ में अब सब कुछ छूट गया है,
अंधेरों में डूबा मेरा घर मुझसे ही रूठ गया है,
एक डोर खींचती है मुझे उसकी तरफ,
घर कहता है, मैं साथी था तेरा बचपन से अब तक,
आखिर तेरी यादों को मैंने ही तो सहेज के रखा है,
तू गुनहगार है मेरा, देखना तेरा अंत तुझे लाएगा मुझ तक|

माँ की नज़रें सब कुछ बयां करती हैं,
दर्द में झूठी ख़ुशी का इज़हार वो खुद ही तो करती हैं,
चल माँ, आज तुझे तेरे घर की सैर कराऊँ,
तेरी अचार की बरनी से, आज अचार फिर से चट कर जाऊँ,
एक बार फिर, क्यों न तुझसे फिर ज़िद्द कर जाऊँ,
हमें घर बुलाता है माँ,
चल, आज फिर तुझे घर की सैर कराऊँ … 🙂


Background Music Credit: incompetech