एहसास… बढ़ते फासलों का

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वो पल भी बड़ा मजबूर था, जब तू मुझसे दूर था,
जब तेरे नाम की रट, मेरी सिसकियाँ लगाया करती थी,
जब मेरी परछाई भी, तुझे ना दिखाई पड़ती थी|

ये कमरा सुनता था मेरी चीख की गूँज,
मेरा बिस्तर सोख लेता था आँसूं की हर एक बूँद,
हथेली की लकीरें माथे पर दिखा करती थी,
मेरी फूटी किस्मत के किस्से बयाँ करती थी|

तू नींद में डूब जाता था मुझे बिलखता छोड़,
तेरा काम था मेरे आँसुओं से अनमोल,
दुनिया से किये गए तेरे वादे थे अटल,
पर मुझे दी गयी कसमें,
बन गयी थी बस फसानो भरी ग़ज़ल|

मुझे तनहा छोड़कर तू चला जाता था,
सितारों तले मुझे चाँदनी में जगा जाता था,
कैसे आते थे तुझे परियों के स्वप्न मेरे बिना?
मेरा तो चैन भी तू ही ले जाता था|

मैं तेरी मजबूरी समझूँ ये तेरी इच्छा थी,
अपने काम को बढ़ावा दूं ये तेरी भी तमन्ना थी,
तेरे खुले विचार कभी अपनी पसंद पर नाज़ कराते थे,
तो कभी ये ही हमारे दूर होने का एहसास दे जाते थे|


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