Shayari

वक़्त-ए-रफ़्तार को थामने की गुस्ताख़ी किस्मत ने क्या की,

कि अंजाम के रूबरू होने से पहले ही मंज़िल बदल दी |

वक़्त की गिरफ्त में जब कुछ आँधियां घिर जाती हैं,
महकती गलियां भी जब खिलखिलाते फूलों को याद करती हैं,
शांत सवेरे जब सन्नाटों कि गूँज में बदल जाते हैं,
तब कहीं, दिल टूटने की खनक दबा दी जाती है|

ऐ दिल! कुछ पल हमसे भी रूबरू हुआ करो,

बेचैन घड़ियों में साथ दिया करो,

तेरी बदमाश धड़कनें गुदगुदी किया करती हैं,

मेरे चंचल मन को सपने दिखाया करती हैं|

Inspired from The Daily Post

दीवानों कि बस्ती में एक पगली का पहरा था,
खुदा के बंदों पर उसका विश्वास भी तो गहरा था,
बेनक़ाब मुस्कुराती धूप सी खिलती थी वो,
अपनी ही सुध में बेखौफ घूमती थी वो,
कहती थी दुनिया नहीं है मनचले परवानो की,
ये जहाँ तो है खुदा के कुछ अफ़सानो की|