Shayari

मोहब्बत नामुमकिन तो नहीं बस सब्र की मुहताज है,
इस उदास बेचैनी को तो बस उनकी आहट का इंतिज़ार है|

खामोश अल्फ़ाज़ों को सुनने कि ताकत हम में कहाँ,
ये खता तो अक्सर चुलबुली धड़कनें करती हैं|

हँसी-ठिठोली कि लड़ियाँ जब शोर का रूप लेती हैं,
बंद द्वार के पीछे सुख बिखेर देती हैं,
कक्ष के एक कोने में तब हँसी साँस लेती है,
गम के दरवाज़ों को मुस्कान से वो ढक देती है|

मुकम्मल साथ पाना कठिन कहाँ होता है,
बस ज़र्रे भर पहल की ज़रूरत है|

पहली साँस तो बेपरवाह पँछी सी होती है,
हलक-ए-पर तो बस मोहब्बत की बलि चढ़ते हैं|