आगमन… कुछ सवालों का!

उम्मीदें तुम्हारी खुलकर बयाँ करो,
नई ज़िन्दगी के पट को खोला करो,
सफर साथ तय करना है हमें,
हर कदम साथ चलना है हमें|

मन की छवि आँखों में दिखने दो,
अपनी तमन्नाओं को ज़रा पँख तो लगने दो,
आओ आज दो पल साथ चलकर देख लें,
यादों के सफर का आगमन तो कर लें|

तेरी चाहत व् बगावतों का हिस्सा तो बना,
अपनी ज़िन्दगी से रूबरू मुझे ज़रा सा करा,
अपने राजकुमार से मिलाकर तो देख,
मेरी रूह को करीब से पहचान कर तो देख|


यह कविता का अंत नहीं है| इन सभी सवालों के जवाब आप लोगो को मेरी अगली कविता में मिलेंगे| मैं जल्द ही जवाबों के साथ लौटूंगी| 🙂

PS: कविता का दूसरा भाग, ‘जवाब… तेरे सवालों का!’ आप यहाँ पढ़ सकते हैं|

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