जवाब… तेरे सवालों का!

कुछ वक़्त पहले मैंने एक कविता लिखी थी, ‘आगमन… कुछ सवालों का!’, जिसमें कुछ सवाल उठे थे| यह कविता उन्हीं सवालों का जवाब है| उम्मीद करती हूँ कि आपको यह जवाब पसंद आएंगे|

तेरे सवालों से बेहाल सी हूँ मैं,
किसी छुपी छवि से अनजान सी हूँ मैं,
मेरे जवाब तेरी सोच से परे हैं,
मेरा राजकुमार तेरी दुनिया से नहीं है|

ख़्वाबों में मेरे बस राजकुमार ही नहीं,
प्रेम कहानियों में काफिर हैं कई,
जज़्बातों को प्रेम से नहीं तोला करते,
भावनाओं पर इस तरह सवाल नहीं उठाते|

एक नज़र कि तलाश है जो मुझे ढूंढती हो,
एक हाथ जो मुझे थामने को बेचैन हो,
बिन लव्ज़ों के जो मोहब्बत बयाँ कर दे,
दो कदम जो मुझ तक पहुँचने का रास्ता ढूंढ लें|

ठोकरों को वो मेरे रास्ते से हटा दे,
मैं जो लड़खड़ा जाऊँ तो मुझे संभाल ले,
मुझे घर संवारने का साधन न बनाये,
मेरे सपनों को भी तो वो अपनाये|

एक घर जिसमें हमारे सपने बसते हों,
उम्मीदों से पहले मोहब्बत पनपती हो,
तरक्की नहीं इंसान की कीमत हो,
जहाँ अहं के लिए घर के पट बंद हों|

क्या तुम यही जवाब मुझसे चाहते थे?
या दिल के एक कोने को बस यूँ ही टटोलते थे?
मेरा राजकुमार सवाल नहीं करता,
सपनों में आता है इंतज़ार नहीं करता| 🙂

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