kitab

दास्तान

बचपन बीता बचपने में, लड़कपन बीता खेल खिलोनो में, जवानी लायी नयी तरंगें, किताबें न बन पायी उमंग कि पतंगें| भीड़ में सब दौड़ते हैं, दोस्त-साथी पीछे छूट चुके हैं, लड़कपन के खिलोने याद आते हैं, वो जवानी कि तरंगे याद दिलाते हैं| मासूमियत छूट गयी है कहीं, बस नोटों कि सरसराहट में छुप गयी है…

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