किताब-ए-दास्तान

बचपन बीता बचपने में,
लड़कपन बीता खेल खिलोनो में,
जवानी लायी नयी तरंगें,
किताबें न बन पायी उमंग कि पतंगें|
भीड़ में सब दौड़ते हैं,
दोस्त-साथी पीछे छूट चुके हैं,
लड़कपन के खिलोने याद आते हैं,
वो जवानी कि तरंगे याद दिलाते हैं|
मासूमियत छूट गयी है कहीं,
बस नोटों कि सरसराहट में छुप गयी है कहीं,
अब कलम-किताबें अपनी सी लगती हैं,
लव्ज़ों के डोर को बाँध कर मज़बूत कर चुकी हैं|
कलम उठाये लिखने चले हैं दस्तान अपनी,
यह किताबें गुरु बनी हैं मेरी,
सखी जैसी साथ चला करती हैं,
लव्ज़ों का मतलब अब सिखाने लगी हैं|
मुसाफिर फिर लौटे हैं आज,
मेरी कहानी को दस्तक देने लगे हैं आज,
यह नोटों कि सरसराहट नहीं अब,
यह तो दास्तान है हमारी मोहब्बत कि बस|

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