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जब कला, योग्यता व् गुणों का मोल-भाव किया जाता है तब दहेज़ जन्म लेता है| इसके खिलाफ आवाज़ उठाना हम सबका फ़र्ज़ है| पर क्या हम भेंट कि आड़ में इसे अपने घरों में पनपने तो नहीं दे रहे?

यह कविता ससुराल या लड़कों पर प्र्श्न नहीं उठाएगी| ये प्र्श्न उठा रही है आप और मुझ पर| ये एक दबी हुयी आवाज़ है जो कभी-कभी इस देश के कुछ हिस्सों में सुनाई देती है|


वो फर्क करते हैं हमारी तरक्की पर,
नाज़ करते हैं बुद्धिमत्ता पर,
हमारी कला उन्हें रचनात्मक लगती है,
कल्पनाओं का समुन्दर प्रतीत होती है|

हम उन्हें गुणों का भण्डार लगते हैं,
शायद गर्व करने का तुछ सामान लगते हैं,
कड़ी तपस्या कि अपेक्षा वो हमसे कहाँ करते हैं,
किस्मत को उगते सूरज कि सीढ़ी समझते हैं|

सम्पति से वो हमारा मान करते हैं,
झुमकी कँगनो से अपनापन नापते हैं,
हमारी नज़्मों में सरस्वती ढूंढते हैं,
फिर लक्ष्मी से तुलना कर,
उसे अपमानित कर देते हैं|

ज्ञान से भरपूर साथी कि कामना करते हैं,
पर शिक्षित बहुओं का कहाँ सम्मान करते हैं,
सपनों को कुचलना तो फ़र्ज़ है महिलाओं का,
आखिर कला को छुड़वाना तो हक़ है ससुराल का|

दुल्हन

सेज पर बैठी एक दुल्हन, पिया का इंतज़ार कर रही थी, अब आयेगा पिया यह सोचकर, मन ही मन मुस्कुरा रही थी, आँखें झुकी मन में प्यार, पलके झुकाए कर रही थी पिया का इंतज़ार| इंतज़ार की घडी ख़तम हुयी, उमंग के दरवाज़े खुले, काश यह लम्हा यूँ ही थम जाता, और सिर्फ तुम होते,…

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