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mann-ki-mann-se-baat

रात दिन की ये गुफ्तगू , कब खत्म होंगी, ये कमबख्त मौत है की आती नहीं, और ज़िन्दगी फिसलती जा रही है. जैसे फूल मुरझा जाता है, दो दिन खिलके, जीना भूल जाता है, तो क्यों न हम जीयें ऐसे, जैसे जिया जाता है मरने के बाद. वक़्त गुज़र गया तो क्या, कि जीना भी…

Read more मन की मन से बात