sher

दीवानों कि बस्ती में एक पगली का पहरा था,
खुदा के बंदों पर उसका विश्वास भी तो गहरा था,
बेनक़ाब मुस्कुराती धूप सी खिलती थी वो,
अपनी ही सुध में बेखौफ घूमती थी वो,
कहती थी दुनिया नहीं है मनचले परवानो की,
ये जहाँ तो है खुदा के कुछ अफ़सानो की|

वक़्त में नुक्स निकालने के लिए माहिर थे वो,
खता हमारी इबादत के पैमाने में डालते थे वो,
हमारी रातें यूँ ही भेंट कर देते थे वो,
फिर भी दुनिया के लिए हमारे हमसफ़र थे वो|

तिनका-तिनका करके विश्वास बनाया था,
तेरे जाने से पहले, न होने का एहसास बनाया था|